जलद


हे!बादल , हे! जलद
हो लिए प्रसन्नता या उन्माद
ये झर झर झरते मोती
हैं प्रेमालाप या वियोग नयनजल
कभी चमकना,कभी गर्जना
हो हर्षित या क्रोधित
कही हो आशा कही हो प्रलय
हो अनुरागी या द्वेषी
हो लिए स्थिरता या मन में चंचलता
ये कभी बरसना कभी ठहरना
हैं पीड़ा या क्रीड़ा तुम्हारी
हे!बादल , हे! जलद

– हर्षिता

9 responses to “जलद”

  1. बहुत सुन्दरता से बादल के बारे में ख़ूबसूरत कविता लिखी हो 🌷🙏✍️
    पढ़ कर बहुत आनन्द मन में आयी 😍बादल को अस्तित्व नहीं, वो अपने
    मनमानी की राह पर चलते है याने वो जैसा चाहे वैसे 👍🏻😊👌बधाइयाँ 🙏

    Liked by 1 व्यक्ति

  2. अति सुन्दर पंक्तियां 👌👌

    Liked by 1 व्यक्ति

टिप्पणी करे

Why are you reporting this comment?

Report type
Design a site like this with WordPress.com
प्रारंभ करें