नई दिशा

इक्कीसवीं सदी -विज्ञान और तरक्की का युग। विज्ञान की देन है कि दूर होते हुए भी हम एक दूसरे से बात कर सकते हैं। घर बैठे हजारों काम आप ऑनलाइन कर सकते जिसकी कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी । सभी आधुनिकता के रंग में रंग गए हैं। सभी की जीवन शैली अपडेट हो गई हैं। बस अपडेट होना रह गया तो लोगों की मानसिकता , सामाजिक कुरीतियां , पुराने ख्याल। मैं यह बिल्कुल नहीं कहती की पुराने सभी रीति रिवाज गलत हैं या पुराने लोगों को जीवन जीने का तरीका नहीं पता हैं। पुरानी जीवन शैली और आधुनिक जीवन शैली का कोई मुकाबला नहीं हैं। हमें पुराने लोगों ने , पुरानी पीढ़ियों ने जितना कुछ दिया उसका कर्ज हम कभी नहीं चूका सकते हैं।
पर जरूरत है की हम पुराने संस्कारो को अपने जीवन में इस प्रकार डाले की उसकी सारी अच्छाइयां अपने अंदर समेट ले और सारी बुराइयां कहीं इतनी दूर फेक दे की वो कभी वापस ना आ सके।

मनमोहक

प्रतिक्षण नूतन वेश बनाकर रंग-बिरंग निराला।
रवि के सम्मुख थिरक रही हैं नभ में वारिद-माला।
– रामनरेश त्रिपाठी

हर कदम जीत की ओर

बाधाओं के शिखर होंगे ,
मुश्किलों का कहर होगा ,
परेशानियों का ढेर होगा ,
फिर भी हर कदम मेरा जीत की ओर होगा ।
राह में गहरे गड्ढे भी होंगे ,
लहरों में मुझे डुबाने का शोर भी होगा ,
हवाओं में मुझे गिराने का जोर भी होगा ,
फिर भी हर कदम मेरा जीत की ओर होगा ।
असफलताओं के ढेर भी होंगे ,
संकल्प हिलाने को मेरा प्रयास भी बेजोर होगा
गिरने पर मेरे , हँसने का इंतजार भी जरूर होगा ,
फिर भी हर कदम मेरा जीत की ओर होगा ।
असफलताओं , बाधाओं से ना मेरे सपने खंडित होंगे ,
हर बार गिरने पर मेरा उठने का प्रयास जरूर होगा ,
हैं यकीन मेरी सफलता का भी एक दिन शोर होगा ,
क्योंकि हर कदम मेरा जीत की ओर होगा ।
-हर्षिता

कब तक ?

 कब तक उलझे रहोगे इसी क्रम में ,
कब तक जीते रहोगे यू मरते मरते ,
कब तक पड़े रहोगे तंद्रालस की कब्र में,
सुलझाओ वर्षों से उलझे इन धागो को ,
जीवन फूंक दो मरे हुए सपनों में ,
उठो,कदम बढ़ाओ लक्ष्य की ओर ।
कब तक बने रहोगे कठपुतली किस्मत की ,
कब तक दफनाओगे अपनी काबिलियत को,
कब तक जकड़े रहोगे आराम की बेड़ियों में,
लिखो अपनी तकदीर मेहनत की स्याही से
रखो विश्वास स्वयं पर , डटे रहो कर्तव्य पथ पर
छोड़ विश्राम की लालसा ,बढ़ो जीत की ओर ।
- हर्षिता

चीख

सब बंद आंखो से देख रहे थे वो मंजर ,
जब बाल पकड़ वह खींच उसे ले जा रहा था घर के अंदर ,
सब बंद कानों से सुन रहे थे आह की चीख वो ,
जिसका दर्द था गहरा जितना समन्दर ,
सब गूंगो की तरह रोक रहे थे उस दरिंदे को ,
तनिक भी ना थी इंसानियत जिसके अंदर ,
जुर्म देखना हो तो आंखे बंद कर नहीं ,
भर इनमें चिंगारी देखो कि जल कर राख हो जाए जुर्म करने वाला ।
चीख सुननी हो तो कान बंद कर मत सुनो , उस चीख को उतार लो अपने भीतर ,
इतना भीतर की भयभीत हो उठे दर्द देने वाला ।
गुनाह रोकना हो तो मत रोको गूंगो की तरह ,
चीखो इतनी जोर से की तड़प कर रह जाए तड़प देने वाला ।
-हर्षिता

मैं इंसानियत हूं

मैं हिंदू हूं ,
जो मस्जिद के आगे सिर झुकाता है
जो गुरूद्वारे में भी माथा टेकने जाता है
जो चर्च में भी कैंडल जला कर आता है
जो मंदिर में दिया जलाने जाता है
क्योंकि मैं हिंदू ही नहीं भारतीय भी हूं ।
मैं मुस्लिम हूं ,
जो मंदिर के आगे झुक जाता हैं
जो जोर- शोर से लोहडी भी मनाता हैं
जो क्रिसमस में भी खुशियां मनाता हैं
जो नमाज़ अदा करने मस्जिद भी जाता हैं
क्योंकि मैं मुस्लिम ही नहीं भारतीय भी हूं।
मैं सिक्ख हूं ,
जो ईस्टर भी मनाता हैं
जो क़ुरान पढ़ना भी जानता हैं
जो होली में रंग भी लगाता हैं
जो वैशाखी भी मनाता हैं
क्योंकि मैं सिक्ख ही नहीं भारतीय भी हूं।
मैं ईसाई हूं ,
जो गुरुनानक के कदमों पर चलता हैं
जो गीता का ज्ञान भी ग्रहण करता हैं
जो ईद भी मनाता हैं
जो बाइबिल भी पढ़ता हैं
क्योंकि मैं ईसाई ही नहीं भारतीय भी हूं।
मैं धर्म हूं ,
जो लिंग, जाति की सीमाओं से परे हैं
इंसानियत की जिसके अंदर गहरी जड़े हैं
जो दिल में प्यार , होठों पर मिठास रखता हैं
जो हर बुराई से सबके साथ मिलकर लड़ता हैं
क्योंकि मैं धर्म ही नहीं इंसानियत भी हूं । - हर्षिता

मेरी डायरी

ज़िंदगी में ऐसे ना जाने कितने मौके आते हैं जब हम सोचते है की अगर हमने अपना ये लक्ष्य पा लिया तो हमारी ज़िंदगी से सारी समस्या समाप्त हो जाएगी। उदाहरण के लिए जब हम छात्र होते है तो हमे लगता हैं की अगर हमनें परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन किया और अच्छे मार्क्स स्कोर किए तो हमारी सारी समस्या खत्म हो जाएंगी।जब हम थोड़े और बड़े होते है तो लगता है की बस अच्छी सी नौकरी लग जाए फिर तो जीवन में कोई समस्या ही नहीं रहेगी , पर नौकरी लग जाने के बाद सोचते है की बस अपने मन पसंद व्यक्ति से विवाह हो जाए तो जीवन परेशानियों से मुक्त हो जायेगा । फिर विवाह पश्चात सोचने लगते है की बच्चे अच्छे से पढ़े, उनकी नौकरी लग जाए , अच्छे घर में शादी हो जाए तो सभी समस्यों का हाल हो जायेगा । इसी उधेड़ बुन में ना जाने कब वृद्धावस्था आ जाती हैं और फिर जीवन का अंत मृत्यु।

हमारे सपनों के पूरे होने पर ज़िंदगी पहले से खुबसूरत तो हो जाती हैं पर सच तो ये है इन सबके बाद भी जीवन और परेशानियां कभी अलग नहीं होती । उनका एक दूसरे के साथ बहुत गहरा बंधन होता है । वो हमेशा एक दूसरे से जुड़ी रहती हैं। और देखा जाए तो जीवन का आनंद भी इसी में हैं।

अगर समस्याएं ना हो तो इंसान का जीवन तालाब की तरह हो जायेगा । इसे नदी की तरह सुंदर और पवित्र बनाने के लिए मुश्किलों का आना बेहद ज़रूरी हैं।

विरह

हाय! विरह की यह तड़प
वेदना देती, कष्ट देती
मन को छिन्न भिन्न कर देती
हृदय में शूल सी चुभती
नयनों में जल भर देती
हाय!विरह की यह तड़प
आशा देती, ढांढस देती
मिलन के दृश्य जीवित कर देती
जागती आंखों से स्वपन दिखलाती
क्षण में स्वपन खंडित कर देती
हाय! विरह की यह तड़प
- हर्षिता