कई बार कमरा बन जाता है पूरा संसार,
कभी सुकून देता है,
तो कभी लगता है
इसकी दीवारें सिमट जाएँगी।
निगल लेंगी मेरे अस्तित्व को,
एक अजीब सा डर ।
इसकी छत में
एक गहरा सन्नाटा है।
सोचती हूँ
क्या ये दीवारें मुझे निगल लेंगी ?
या फिर
हौसला देंगी आसमान देखने का?
– हर्षिता
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