चलते रहो

उठो , जागो, चलो
लक्ष्य की ओर बढ़ते रहो
बिना रुके , बिना थके
अथक प्रयास करते रहो
न मिलें मंज़िल जब तक
बस चलते रहो , चलते रहो,
बेड़ियों को तोड़कर ,
बाधाओं को भूल कर बढ़ते रहो
हवाओं का रुख मोड़कर
पहाड़ों को तोड़कर
अपना मकसद गढ़ते रहो
उठो,जागो ,चलो
अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहो
न मिलें मंजिल जब तक
बस चलते रहो चलते रहो
– हर्षिता

“चलते रहो” के लिए प्रतिक्रिया 9

  1. बहुत-बहुत सुन्दर सच की कविता है ये 🌷🙏👍🏻 ज़िन्दगी हमारी सुख दुख मिश्र की है , इसलिए हम बिना थके
    अपने मंज़िल तक साहस के साथ चलना है 👏👍🏻😊 बहुत बधाइयाँ ✍️👌🙏

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    1. धन्यवाद……..आपकी कॉमेंट्स मुझे सदैव प्रोत्साहित करती है 🤗

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      1. हार्दिक शुभकामनाएँ 🌷🙏♥️😊

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  2. चलते रहो चलते रहो
    जीवन के गीत चुनते रहो

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  3. बस चलते रहो, चलते रहो,
    बेड़ियों को तोड़कर,
    बाधाओं को भूल कर बढ़ते रहो

    बहुत ही बेहतरीन पंक्ति…..बेहद प्रेरणादायी ❤

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