प्रकृति


मैं कहाँ और तुम कहाँ
पर देखो यह चाँद दोनों पर नज़र रखे हैं ,
इसकी चाँदनी अंधेरा मिटाती हैं ,
तुम्हारे आँगन में भी और मेरे आँगन में भी ,
स्पर्श से तृप्त करती हैं यह ,
मेरे हृदय को भी और तुम्हारे हृदय को भी।
दोनों मौन, दोनों अकेले,
पर देखो यह हवा दोनों से बातें करती हैं ,
चंचलता से अपनी प्रसन्न करती हैं,
तुम्हें भी और मुझे भी ,
संदेश ले जाती हैं यहां से वहां,
मेरे मन के भी और तुम्हारे मन के भी।
मैं यहां और तुम वहां ,
पर देखों यह प्रकृति दोनों को मिलाती हैं।
- हर्षिता

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