चीख

सब बंद आंखो से देख रहे थे वो मंजर ,
जब बाल पकड़ वह खींच उसे ले जा रहा था घर के अंदर ,
सब बंद कानों से सुन रहे थे आह की चीख वो ,
जिसका दर्द था गहरा जितना समन्दर ,
सब गूंगो की तरह रोक रहे थे उस दरिंदे को ,
तनिक भी ना थी इंसानियत जिसके अंदर ,
जुर्म देखना हो तो आंखे बंद कर नहीं ,
भर इनमें चिंगारी देखो कि जल कर राख हो जाए जुर्म करने वाला ।
चीख सुननी हो तो कान बंद कर मत सुनो , उस चीख को उतार लो अपने भीतर ,
इतना भीतर की भयभीत हो उठे दर्द देने वाला ।
गुनाह रोकना हो तो मत रोको गूंगो की तरह ,
चीखो इतनी जोर से की तड़प कर रह जाए तड़प देने वाला ।
-हर्षिता

“चीख” के लिए प्रतिक्रिया 8

  1. बहुत दारुण कविता 😢चीख बहुत दुखी दिल से आते है 👌🙏 अपने दिल का नियंत्रण मत खोना ♥️यही मेरी कोमेंड 🌹😊🙏

    Liked by 2 लोग

टिप्पणी करे

Design a site like this with WordPress.com
प्रारंभ करें