सब बंद आंखो से देख रहे थे वो मंजर ,
जब बाल पकड़ वह खींच उसे ले जा रहा था घर के अंदर ,
सब बंद कानों से सुन रहे थे आह की चीख वो ,
जिसका दर्द था गहरा जितना समन्दर ,
सब गूंगो की तरह रोक रहे थे उस दरिंदे को ,
तनिक भी ना थी इंसानियत जिसके अंदर ,
जुर्म देखना हो तो आंखे बंद कर नहीं ,
भर इनमें चिंगारी देखो कि जल कर राख हो जाए जुर्म करने वाला ।
चीख सुननी हो तो कान बंद कर मत सुनो , उस चीख को उतार लो अपने भीतर ,
इतना भीतर की भयभीत हो उठे दर्द देने वाला ।
गुनाह रोकना हो तो मत रोको गूंगो की तरह ,
चीखो इतनी जोर से की तड़प कर रह जाए तड़प देने वाला ।
-हर्षिता
चीख
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धन्यवाद जी
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